Karnataka Congress Crisis: कांग्रेस आलाकमान ने कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को खारिज कर दिया है, क्योंकि पार्टी राज्य में राजनीतिक, सामाजिक और वित्तीय जोखिम नहीं लेना चाहती।

नई दिल्लीः कांग्रेस आलाकमान ने मंगलवार को कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने की अटकलों पर विराम लगा दिया। रविवार को कर्नाटक कांग्रेस विधायक एचए इकबाल हुसैन ने दावा किया था कि उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को अगले दो से तीन महीने के भीतर राज्य का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिल सकता है। इससे इन अटकलों को हवा मिल रही थी कि कर्नाटक में सीएम पद पर बदलाव होंगे, लेकिन कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने बेंगलुरु में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ये साफ कर दिया कि कोई फेरबदल नहीं होने वाले हैं। बेंगलुरु में सुरजेवाला जिस वक्त प्रेस को संबोधित कर रहे थे, उस वक्त एक तरफ डीके शिवकुमार भी बैठे हुए थे। कांग्रेस पार्टी वर्तमान में कर्नाटक को लेकर किसी भी तरह का जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं है। इसकी कई अहम वजहें हैं जो राजनीतिक, सामाजिक, वित्तीय और सांगठनिक दृष्टि से जुड़ी हुई हैं।
इसी तरह उत्तर प्रदेश में सपा प्रमुख अखिलेश यादव अगला विधानसभा चुनाव कांग्रेस के साथ लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। यूपी में कुछ ही दिनों बाद पंचायत चुनाव भी होने हैं। अखिलेश यादव पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक यानी पीडीए के मसले पर चुनाव मैदान में जा रहे हैं। ऐसे में, राहुल गांधी की नजर यूपी का सियासी मैदान पर भी है, जहां वह कोई रिस्क लेना नहीं चाहेंगे।
कर्नाटक भी कम संवेदनशील राज्य नहीं
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि कर्नाटक में ही सामाजिक आधार की बात करें तो कांग्रेस की पकड़ ‘AHINDA’ यानी अल्पसंख्यक, हिंदू पिछड़े वर्ग और दलित-गठबंधन पर रही है। लेकिन हाल ही में लीक हुए जाति जनगणना रिपोर्ट ने कुछ पिछड़ी जातियों में नाराज़गी पैदा की है। यह स्थिति बीजेपी और जेडीएस के लिए एक अवसर बन रही है। यदि कांग्रेस सरकार में अस्थिरता या नेतृत्व विवाद जैसी स्थिति बनती है, तो सामाजिक समीकरण भी डगमगा सकते हैं, जिससे पार्टी का परंपरागत समर्थन आधार खिसक सकता है।
कर्नाटक फिलहाल कांग्रेस के लिए सबसे महत्वपूर्ण राज्य
कर्नाटक फिलहाल कांग्रेस का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण राज्य है। 2023 के विधानसभा चुनाव में मिली स्पष्ट बहुमत की जीत के बाद यह राज्य न केवल पार्टी की साख का केंद्र बन गया, बल्कि पूरे दक्षिण भारत में उसका सबसे मज़बूत गढ़ भी बन चुका है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उत्तर भारत से अपेक्षाकृत कम सफलता मिली, लेकिन कर्नाटक से उसे 28 में से 10 सीटें मिलीं। यह सफलता पार्टी की कुल सीटों का एक बड़ा हिस्सा है और इसी राज्य की बदौलत कांग्रेस गठबंधन की राजनीति में प्रभावी भूमिका निभा सकी।
कर्नाटक में बदलाव हुए तो क्या होगा?
असल में, कांग्रेस के भीतर कर्नाटक में नेतृत्व संतुलन बहुत नाज़ुक है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच सत्ता साझेदारी की एक मौखिक समझ बनी थी कि सिद्धारमैया ढाई साल के बाद पद छोड़ेंगे और शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिलेगा। अब जबकि यह समय धीरे-धीरे करीब आ रहा है, दोनों नेताओं के समर्थक विधायकों के बीच आपसी खींचतान तेज़ होती जा रही है। यदि आलाकमान समय से पहले या बिना सहमति के कोई बदलाव करता है, तो इससे पार्टी में खुलेआम गुटबाज़ी और सत्ता संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है। बीजेपी और जेडीएस ऐसे किसी भी आंतरिक विवाद को भुनाने में देर नहीं लगाएंगे।सिद्धारमैया पर रिस्क क्यों नहीं लेना चाहते राहुल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिद्धारमैया कुरुबा समुदाय से आते हैं, जो कर्नाटक में पिछड़ा समुदाय है। अगर सिद्धारमैया को सीएम पद से हटाया जाता तो यह कदम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की उस राजनीति के खिलाफ जाता जिसमें वह दलित-पिछड़ों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की बात मुखरता से करते हैं। सिद्धारमैया पर कोई भी फैसला लेने का असर सिर्फ कर्नाटक में ही देखने को नहीं मिलता, बल्कि इसका दूरगामी परिणाम हो सकता है।यूपी-बिहार पर राहुल की नजर
बिहार में रोज-ब-रोजविधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज होती जा रही हैं। बिहार जातीय अस्मिता की राजनीति के लिहाज से बहुत ही संवेदनशील राज्य रहा है, जहां कांग्रेस लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के साथ चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी में है। ऐसे राहुल गांधी सिद्धारमैया को लेकर कोई भी ऐसा दांव खेलने का जोखिम तो लेना नहीं चाहेंगे जिससे पूरे देश में यह संदेश जाए कि राहुल गांधी अपने राजनीतिक फायदे के लिए सिर्फ दलित-पिछड़ा की बात करते हैं, जबकि उन्हें सियासी मौका देने से परहेज करते हैं।इसी तरह उत्तर प्रदेश में सपा प्रमुख अखिलेश यादव अगला विधानसभा चुनाव कांग्रेस के साथ लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। यूपी में कुछ ही दिनों बाद पंचायत चुनाव भी होने हैं। अखिलेश यादव पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक यानी पीडीए के मसले पर चुनाव मैदान में जा रहे हैं। ऐसे में, राहुल गांधी की नजर यूपी का सियासी मैदान पर भी है, जहां वह कोई रिस्क लेना नहीं चाहेंगे।
कर्नाटक भी कम संवेदनशील राज्य नहीं
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि कर्नाटक में ही सामाजिक आधार की बात करें तो कांग्रेस की पकड़ ‘AHINDA’ यानी अल्पसंख्यक, हिंदू पिछड़े वर्ग और दलित-गठबंधन पर रही है। लेकिन हाल ही में लीक हुए जाति जनगणना रिपोर्ट ने कुछ पिछड़ी जातियों में नाराज़गी पैदा की है। यह स्थिति बीजेपी और जेडीएस के लिए एक अवसर बन रही है। यदि कांग्रेस सरकार में अस्थिरता या नेतृत्व विवाद जैसी स्थिति बनती है, तो सामाजिक समीकरण भी डगमगा सकते हैं, जिससे पार्टी का परंपरागत समर्थन आधार खिसक सकता है।कर्नाटक फिलहाल कांग्रेस के लिए सबसे महत्वपूर्ण राज्य
कर्नाटक फिलहाल कांग्रेस का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण राज्य है। 2023 के विधानसभा चुनाव में मिली स्पष्ट बहुमत की जीत के बाद यह राज्य न केवल पार्टी की साख का केंद्र बन गया, बल्कि पूरे दक्षिण भारत में उसका सबसे मज़बूत गढ़ भी बन चुका है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उत्तर भारत से अपेक्षाकृत कम सफलता मिली, लेकिन कर्नाटक से उसे 28 में से 10 सीटें मिलीं। यह सफलता पार्टी की कुल सीटों का एक बड़ा हिस्सा है और इसी राज्य की बदौलत कांग्रेस गठबंधन की राजनीति में प्रभावी भूमिका निभा सकी।
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